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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वृहन्नडो उवाच
दाय़ादं मत्स्यराजस्य कुले जातं मनस्विनम् |  १३   क
कथं त्वा निन्दितं कर्म कारय़ेय़ं नृपात्मज ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति