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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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दुर्योधन उवाच
हतो जय़द्रथश्चैव सौमदत्तिश्च वीर्यवान् |  ३१   क
अभीषाहाः शूरसेनाः शिवय़ोऽथ वसातय़ः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति