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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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सञ्जय़ उवाच
सर्वथा हतमेवैतत्कौरवाणां महद्वलम् |  ४   क
न ह्यस्य विद्यते त्राता साक्षादपि पुरन्दरः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति