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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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सञ्जय़ उवाच
यस्य वीर्यं समाश्रित्य शमं याचन्तमच्युतम् |  ७   क
तृणवत्तमहं मन्ये स कर्णो निर्जितो युधि ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति