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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
रमे चाहं त्वय़ा सार्धमरण्येष्वपि पाण्डव |  १७   क
किमु यत्र जनोऽय़ं वै पृथा चामित्रकर्शन ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति