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शान्ति पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
यथावत्पूजितो राजन्गृहं गन्तासि मे गृहात् |  २५   क
ततः सम्पूज्य तौ विप्रं विश्वस्तौ जग्मतुर्गृहान् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति