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शान्ति पर्व
अध्याय १२६
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भीष्म उवाच
अर्थय़न्कलशं राजन्काञ्चनं वल्कलानि च |  २२   क
निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निराशः समपद्यत ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति