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शान्ति पर्व
अध्याय १२६
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राजो उवाच
आशाय़ाः किं कृशत्वं च किं चेह भुवि दुर्लभम् |  ३३   क
व्रवीतु भगवानेतत्त्वं हि धर्मार्थदर्शिवान् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति