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शान्ति पर्व
अध्याय १२६
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राजो उवाच
कृशाकृशे मय़ा व्रह्मन्गृहीते वचनात्तव |  ३६   क
दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिव द्विज ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति