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शान्ति पर्व
अध्याय १२६
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राजो उवाच
त्वत्तः कृशतरं किं नु व्रवीतु भगवानिदम् |  ३८   क
यदि गुह्यं न ते विप्र लोकेऽस्मिन्किं नु दुर्लभम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति