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शान्ति पर्व
अध्याय २९१
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वसिष्ठ उवाच
अव्यक्ताद्व्यक्तमुत्पन्नं विद्यासर्गं वदन्ति तम् |  २१   क
महान्तं चाप्यहङ्कारमविद्यासर्गमेव च ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति