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शान्ति पर्व
अध्याय १३८
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भीष्म उवाच
शत्रुं च मित्ररूपेण सान्त्वेनैवाभिसान्त्वय़ेत् |  १५   क
नित्यशश्चोद्विजेत्तस्मात्सर्पाद्वेश्मगतादिव ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति