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अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
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वैशम्पाय़न उवाच
मृगैश्च विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम् |  १८   क
शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीप्तदर्शनम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति