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शान्ति पर्व
अध्याय २१९
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नमुचिरु उवाच
यत्र यत्रैव संय़ुङ्क्ते धाता गर्भं पुनः पुनः |  ११   क
तत्र तत्रैव वसति न यत्र स्वय़मिच्छति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति