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अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो नाराय़णो दृष्ट्वा तानृषीन्विस्मय़ान्वितान् |  २३   क
प्रश्रितं मधुरं स्निग्धं पप्रच्छ वदतां वरः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति