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अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
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वासुदेव उवाच
यदाश्चर्यमचिन्त्यं च गिरौ हिमवति प्रभो |  ४८   क
अनुभूतं मुनिगणैस्तीर्थय़ात्रापराय़णैः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति