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अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
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वासुदेव उवाच
तद्भवानृषिसङ्घस्य हितार्थं सर्वचोदितः |  ४९   क
यथादृष्टं हृषीकेशे सर्वमाख्यातुमर्हति ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति