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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
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भीष्म उवाच
निष्क्रम्य वनमास्थाय़ ज्ञानय़ुक्तो जितेन्द्रिय़ः |  २५   क
कालाकाङ्क्षी चरन्नेवं व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति