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वन पर्व
अध्याय १२६
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लोमश उवाच
ततस्तं कलशं दृष्ट्वा जलपूर्णं स पार्थिवः |  १४   क
अभ्यद्रवत वेगेन पीत्वा चाम्भो व्यवासृजत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति