वन पर्व  अध्याय २१३

कन्यो उवाच

सा हृता तेन भगवन्मुक्ताहं त्वद्वलेन तु |  १९   क
त्वय़ा देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जय़म् ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति