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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रौणिर्धनुर्न्यस्य रथात्प्रस्कन्द्य वेगितः |  ४२   क
धिग्धिक्सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद्रणात् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति