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वन पर्व
अध्याय १२६
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लोमश उवाच
शृणुष्वावहितो राजन्राज्ञस्तस्य महात्मनः |  ४   क
यथा मान्धातृशव्दो वै लोकेषु परिगीय़ते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति