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आदि पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
वृषपर्वेति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः |  १६   क
दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति