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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
स द्वादशाहं जलवाय़ुभक्षः; कुर्वन्क्षपाहःसु तदाभिषेकम् |  १७   क
समन्ततोऽग्नीनुपदीपय़ित्वा; तेपे तपो धर्मभृतां वरिष्ठः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति