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उद्योग पर्व
अध्याय १२६
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वैशम्पाय़न उवाच
विषेण सर्पवन्धैश्च यतिताः पाण्डवास्त्वय़ा |  १५   क
सर्वोपाय़ैर्विनाशाय़ न समृद्धं च तत्तव ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति