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उद्योग पर्व
अध्याय १२६
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वैशम्पाय़न उवाच
न शर्म प्राप्स्यसे राजन्नुत्क्रम्य सुहृदां वचः |  २०   क
अधर्म्यमय़शस्यं च क्रिय़ते पार्थिव त्वय़ा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति