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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
तदस्य सर्वं चिच्छेद क्षिप्तं क्षिप्तं शितैः शरैः |  ६७   क
व्याय़ुधं नावधीच्चैनं कर्णः कुन्त्या वचः स्मरन् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति