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उद्योग पर्व
अध्याय १२६
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्वद्ध्वा धर्मपाशैश्च स्वैश्च पाशैर्जलेश्वरः |  ४६   क
वरुणः सागरे यत्तो नित्यं रक्षति दानवान् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति