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उद्योग पर्व
अध्याय १२६
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वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |  ४८   क
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति