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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यावसथवान्वीर पुण्यकृद्भिर्निषेवितः |  १३   क
विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतकस्य ह |  १३   ख
स नगो वेश्मसङ्कीर्णो देवलोक इवावभौ ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति