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द्रोण पर्व
अध्याय १२६
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सञ्जय़ उवाच
पुत्राणामिव चैतेषां धर्ममाचरतां सदा |  १७   क
द्रुह्येत्को नु नरो लोके मदन्यो व्राह्मणव्रुवः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति