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द्रोण पर्व
अध्याय १२६
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सञ्जय़ उवाच
नाहत्वा सर्वपाञ्चालान्कवचस्य विमोक्षणम् |  ३२   क
कर्तास्मि समरे कर्म धार्तराष्ट्र हितं तव ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति