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द्रोण पर्व
अध्याय १२६
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सञ्जय़ उवाच
धर्मार्थकामकुशलो धर्मार्थावप्यपीडय़न् |  ३५   क
धर्मप्रधानः कार्याणि कुर्याश्चेति पुनः पुनः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति