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द्रोण पर्व
अध्याय १२६
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सञ्जय़ उवाच
चक्षुर्मनोभ्यां सन्तोष्या विप्राः सेव्याश्च शक्तितः |  ३६   क
न चैषां विप्रिय़ं कार्यं ते हि वह्निशिखोपमाः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति