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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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नारद उवाच
ते पिवन्तः कषाय़ांश्च सर्पींषि विविधानि च |  ३२   क
दृश्यन्ते जरय़ा भग्ना नागा नागैरिवोत्तमैः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति