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आदि पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय़ दिव्यलक्षणसूचितम् |  २२   क
पुत्रमङ्गेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरवर्धत ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति