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आदि पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्नेहविक्लवः |  ४   क
अङ्गराज्याभिषेकार्द्रमश्रुभिः सिषिचे पुनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति