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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
आभास्वरा गन्धपा दृष्टिपाश्च; वाचा विरुद्धाश्च मनोविरुद्धाः |  ५१   क
शुद्धाश्च निर्वाणरताश्च देवाः; स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाश्च ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति