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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वासुदेव उवाच
यशसः श्रेय़सश्चैव मूलं मां विद्धि कौरव |  २५   क
मत्तः सर्वेऽभिनिर्वृत्ता भावाः सदसदात्मकाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति