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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिनः |  १३   क
अग्राम्यसुखभोगाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति