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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
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भीष्म उवाच
तृतीय़ं चास्य सम्भूतं नेत्रमादित्यसंनिभम् |  ३०   क
युगान्तसदृशं दीप्तं येनासौ मथितो गिरिः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति