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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
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भीष्म उवाच
किमर्थं च पुनर्देव प्रकृतिस्थः क्षणात्कृतः |  ४२   क
तथैव द्रुमसञ्छन्नः कृतोऽय़ं ते महेश्वर ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति