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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
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महेश्वर उवाच
तस्य चाक्ष्णो महत्तेजो येनाय़ं मथितो गिरिः |  ४५   क
त्वत्प्रिय़ार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थः क्षणात्कृतः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति