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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
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उमो उवाच
हस्ते चैतत्पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति |  ४८   क
जटिलो व्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति