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वन पर्व
अध्याय १२७
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सोमक उवाच
एकः कथञ्चिदुत्पन्नः पुत्रो जन्तुरय़ं मम |  १४   क
यतमानस्य सर्वासु किं नु दुःखमतः परम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति