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वन पर्व
अध्याय १२७
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सोमक उवाच
वय़श्च समतीतं मे सभार्यस्य द्विजोत्तम |  १५   क
आसां प्राणाः समाय़त्ता मम चात्रैकपुत्रके ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति