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वन पर्व
अध्याय १२७
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सोमक उवाच
स्यान्नु कर्म तथा युक्तं येन पुत्रशतं भवेत् |  १६   क
महता लघुना वापि कर्मणा दुष्करेण वा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति