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वन पर्व
अध्याय १२७
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सोमक उवाच
कार्यं वा यदि वाकार्यं येन पुत्रशतं भवेत् |  १८   क
कृतमेव हि तद्विद्धि भगवान्प्रव्रवीतु मे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति