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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
केशवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणोऽथ दारुकः |  ३०   क
न्यवेदय़द्रथं सज्जं केशवाय़ महात्मने ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति