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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |  १   क
विदुरं सर्वधर्मज्ञं त्वरमाणोऽभ्यभाषत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति